देश के प्रसिद्ध शिक्षाविद.बिहार के पूर्व राज्यपाल पद्मश्री डा.डी वाई पाटिल का निधन

पटना.4 अगस्त। बिहार के पूर्व राज्यपाल  पद्मश्री डा.डी. वाई. पाटिल (पूरा नाम ज्ञानदेव यशवंतराव पाटिल) का आज 91 वर्ष की आयु में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में निधन हो गया। वे देश के प्रसिद्ध शिक्षाविद, समाजसेवी, राजनेता और पूर्व राज्यपाल  थे।  वे महाराष्ट्र में कांग्रेस के विधायक रहे। दलीय सीमा से ऊपर उनका लोगों से लगाव रहा।
 डॉ. डी. वाई. पाटिल  2009–2013 तक त्रिपुरा के और 
22 मार्च 2013 – 26 नवंबर 2014 तक बिहार के राज्यपाल रहे।
जुलाई 2014 में कुछ समय के लिए पश्चिम बंगाल के कार्यवाहक राज्यपाल भी रहे।

बिहार विधान परिषद के राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्य रहे प्रदेश जदयू के उपाध्यक्ष रामचंन्द्र भारती ने डा.डी. वाई. पाटिल को खास रूप से याद किया है। निधन की सूचना पाकर मुम्बंई के लिंए पटना से रवाना होने के पहले अश्रुपूरित बड़े भावुक स्वर में श्रद्धांजलि दी। उन्हें अभिभावक के रूप में याद करते हुए कहा कि तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुख्रर्जी से मेरा व्यक्तिगत लगाव के कारण पाटिल साहेव ने सीएम नीतीश कुमार की सहर्ष सहमति से समाजसेवी होने की बदौलत परिषद में आने का मौका मिला धा। अति पिछड़ा समाज से होने और समाज के सामाजिक. शैक्षणिक और आर्धिक उत्धान के लिए मेरी सक्रियता देख पाटिल साहेब का भरपूर प्यार मिलता रहा। बिहार से चले जाने के बाद भी पाटिल साहेब सहित उनके परवार से मैं आज भी जुड़ा हूं। अपने गृह क्षेत्र बख्तियारपुर में पाटिल साहेब के  सहयोग से हमेशा से बाढ राहत-बचाव का काम करता रहा हूं।
श्री भारती के अनुसार राज्यपाल रहते वे एक रुपये सांकेतिक वेतन लिया करते थे और मुम्बंई के लिए कभी भी राजकीय विमान की सुविधा नहीं ली धी।  
श्री भारती ने बताया कि बिहार के राज्यपाल रहनेकी अवधि में  
पहले नीतीश कुमार मई 2014 तक और फिर जीतन राम मांझी की सरकार रही। राज्यपाल होने के साथ-साथ वे बिहार के सभी राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी थे, इसलिए उनके सबसे महत्वपूर्ण निर्णय उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े रहे।
 उनका कार्यकाल राजनीतिक रूप से संवेदनशील दौर में था ।जदयू और भाजपा का गठबंधन टूट चुका था, 2014 का लोकसभा चुनाव हुआ और उसी दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। राज्यपाल के रूप में उनके सबसे महत्वपूर्ण निर्णय संवैधानिक और विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े रहे। मांझी सरकार बनने के बाद राज्यपाल ने विधानसभा में बहुमत साबित करने की संवैधानिक प्रक्रिया सुनिश्चित कराई। उन्होंने किसी भी पक्ष को अनुचित लाभ देने के बजाय संसदीय परंपरा का पालन किया।
डा.पाटिल स्वयं एक बड़े शिक्षा समूह के संस्थापक थे, इसलिए बिहार के विश्वविद्यालयों, मेडिकल शिक्षा और कौशल विकास से जुड़े कार्यक्रमों में उनकी विशेष रुचि रही। 
श्री भारती ने कहा डा.पटिल के व्यक्तित्व और कृतित्व को देश कभी नहीं भूल पायेगा.डी वांई पाटिल शिक्षा संस्थानों में आधुनिक .पारंपरिक और रोजगारमूलक शिक्षा सुलधभ होने के काण ही आज देश-दुनिया में इसकी ख्याति मिली है।

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