महापण्डित राहुल सांकृत्यायन की जयंती पर  बिहार हिन्दी  साहित्य सम्मेलन में आयोजित हुआ समारोह, हुई लघु-कथा गोष्ठी
भारतीय सभ्यता के आठ हज़ार वर्ष का इतिहास है "बोल्गा से गंगा"

पटना, 9 अप्रैल। अद्भुत प्रतिभा के अण्वेशी साहित्यकार महापंडित राहुल सांकृत्यान की विश्रुत कृति "बोल्गा से गंगा" हिन्दी साहित्य का एक रोचक-रोमांचक उपन्यास भर नहीं, मानव-सभ्यता के आठ हज़ार वर्षों का इतिहास है। उस एक पुस्तक के अध्ययन से कोई पाठक मानवजाति की आदिम अवस्था से लेकर २०वीं सदी तक हुई क्रमिक प्रगति को समझ सकता है। वे विश्व की 36 भाषाओं के ज्ञाता, लेखक और अनुवादक थे। यह ज्ञान उन्होंने विभिन्न देशों के भ्रमण और उनके साहित्य का व्यापक अध्ययन से अर्जित किया था।

यह बातें गुरुवार को, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में राहुल जी की जयंती पर आयोजित समारोह और लघुकथा-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि राहुल जी एक अतृप्त जिज्ञासु थे। जगत और जगदीश को जानने की उनकी अकुलाहट प्रबल थी। वे संसार के सभी निगूढ़ रहस्यों को शीघ्र जान लेना चाहते थे। यही अकुंठ जिज्ञासा उन्हें जीवन-पर्यन्त वेचैन और विचलित किए रही, जिससे वे कभी, कहीं भी स्थिर नहीं रह सके। निरन्तर दौड़ते-भागते रहे। लेकिन इसी भागमभाग ने उन्हें संसार का सबसे बड़ा यायावर साहित्यकार, चिंतक और महापंडित बना दिया। यात्रा-साहित्य के वे पुरोधा माने जाते हैं, जिसे उन्होंने "घुम्मकड़ी-साहित्य" कहा था। वे निरन्तर चलते और लिखते रहे। जब उनके पैर थमते, तब लेखनी चलने लगती थी। 
डा सुलभ ने कहा कि, उनकी विद्वता और मेधा अद्भुत थी, जिनसे प्रभावित होकर काशी के पंडितों ने उन्हें महापंडित की उपाधि दी। जब पर्यटन और देशाटन का कोई भी सुलभ साधन नहीं था, उस काल में भी उन्होंने संपूर्ण भारत वर्ष की ही नहीं, तिब्बत, चीन, श्रीलंका और रूस तक की लम्बी यात्राएँ की। जहाँ गए वहाँ की भाषाएँ सीखी, इतिहास और साहित्य का गहन अध्ययन किया। संसार के सभी धर्मों का सार-तत्त्व लेकर अपने विपुल साहित्य के माध्यम से संसार को लाभान्वित किया। बौद्ध-साहित्य का उन्हें गहरा अध्ययन था। हिन्दी का संसार उन्हें यात्रा-साहित्य के पितामह के रूप में मान्यता देता है। उनके द्वारा तिब्बत से खच्चरों पर लाद कर लायी गयीं बौद्ध-साहित्य की अनेक दुर्लभ पांडुलिपियाँ आज भी पटना के संग्रहालय में उपलब्ध है। वे बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के भी अध्यक्ष रहे, जिसपर सम्मेलन को सदा गौरव रहेगा। 

समारोह के मुख्य अतिथि और दूरदर्शन बिहार के कार्यक्रम-प्रमुख डा मनोज प्रभाकर ने कहा कि राहुल जी का मूल नाम केदार पाण्डेय था। उन पर बौद्ध-दर्शन का गहरा प्रभाव था। उन्होंने तिब्बत-श्रीलंका आदि देशों की यात्राएँ की और बौद्ध-साहित्य पर बहुत कुछ लिखा। वे यह मानते थे कि व्यक्ति के मन का उसकी अभिव्यक्ति और स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। 

अतिथियों का स्वागत करती हुई सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा ने कहा कि राहुल जी ने प्राचीन साहित्य को पुरातात्विक दृष्टि से आकलन किया है। यह उनके विपुल साहित्य में दिखाई देता है। भारतीय संस्कृति और हिन्दी के विकास में उनका अवदान अनूठा है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अवकाश प्राप्त अधिकारी और कवि बच्चा ठाकुर, डा रत्नेश्वर सिंह, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, अंजनी राजू, इंदुभूषण सहाय तथा अनुराग मिश्र ने भी अपने विचार व्यक्त किए। समारोह का आरम्भ चंदा मिश्र द्वारा की गयी वाणी-वंदना से हुआ। 

इस अवसर पर आयोजित लघुकथा-गोष्ठी में, विभारानी श्रीवास्तव ने "रिझा दिल", चित्तरंजन भारती ने "कार्टूनिस्ट", डा पूनम आनन्द ने "चूल्हा",डा पुष्पा जमुआर ने "दाल-मखनी", शमा कौसर "शमा" ने "मज़ा", डा मीना कुमारी परिहार ने "नए जमाने का प्रेम", नीता सहाय ने बिंदु की महिमा, मीरा श्रीवास्तव ने "मुक्ति", सागरिका राय ने "निशान", शंकर शरण आर्य ने "भूख",डा मनोज गोवर्द्धनपुरी ने "ईमानदारी",राजप्रिया रानी ने" स्मार्ट सिटी" तथा बिंदेश्वर प्रसाद गुप्ता ने "भूख की मार" शीर्षक से अपनी लघुकथा का पाठ किया। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन प्रबंधमंत्री कृष्णरंजन सिंह ने किया।

सम्मेलन के भवन-अभिरक्षक प्रवीर कुमार पंकज, तारकेश्वर पाण्डेय, राज कुमार चौबे, श्याम मनोहर, विजय कुमार शर्मा, उमाकांत ओझा, अरुण कुमार वर्मा, प्रेम कुमार अग्रवाल, नन्दन कुमार मीत, मनोज कुमार आदि प्रबुद्धजन समारोह में उपस्थित थे।

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