बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में कवयित्री ज्योति मिश्र की पुस्तक
जब पीड़ा ही पीड़ा की औषधि बनी, फ़िक्र ही फ़िक्र का हुआ  उजाला 
पटना, १२ मार्च। जीवन में पीड़ा जब घनीभूत होती जाती है और उसका कोई निदान नहीं मिलता तब एक ऐसी अवस्था भी आती है जब वही पीड़ा, पीड़ा की औषधि बन जाती है। दर्द ही दर्द की दवा हो जाता है। उसी तरह जीवन-संघर्ष को चुनौती के रूप में स्वीकार करने वाले लोगों के लिए हर फ़िक्र भी उजाला हो जाता है। वैसे भी पीड़ा कवियों की बड़ी पूँजी होती है। पीड़ा की कुक्षि से ही बड़ी कविता का जन्म होता है। 

यह बातें गुरुवार की संध्या, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, वरिष्ठ कवयित्री ज्योति मिशे के ग़ज़ल-संग्रह " हर फ़िक्र उजाला है"के लोकार्पण-समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि जीवन संघर्ष का ही दूसरा नाम है। मनुष्य के संपूर्ण जीवन-काल में ख़ुशी और सुख के क्षण बहुत कम ही आतें हैं। आज का आदमी, लालसाओं को इतना बढ़ा लिया है कि दुःख को ढेर सारे आमंत्रण मिल रहे हैं। दुखों को आने के लिए कष्ट उठाना नहीं पड़ता। उसे ससम्मान आमंत्रित किया जा रहा है। कवयित्री ज्योति जी लोकार्पित पुस्तक की ग़ज़लें टूटे दिल वाले लोगों को ताक़त देती हैं। ये ग़ज़लें सिखाती हैं कि किस तरह पीड़ा को आनन्द में बदला जा सकता है और कैसे फ़िक्र भी उजालों के कारक बनाए जा सकते हैं।

पुस्तक का लोकार्पण करते हुए, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और उत्प्रेरक विकास वैभव ने कहा कि जब परमात्मा ने इच्छा की तो सृष्टि की रचना हुई। प्रत्येक सृजन के लिए मूल तत्त्व सृजन की कामना ही है। कवयित्री ज्योति मिश्रा जी एक प्रतिभाशाली लेखिका हैं। इनकी लोकार्पित पुस्तक में समाज की पीड़ा और जीवन के विविध रंगों की अभिव्यक्ति हुई है। 

संस्कृत शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार झा ने कहा कि कवयित्री ज्योति मिश्रा की लोकार्पित पुस्तक का शीर्षक सकारात्मक और प्रेरणादायी है। ज्योति जी की लेखनी से उजाला होना स्वाभाविक है। फ़िक्र को भी उजाले में बदला जा सकता है।

शायर रमेश कँवल ने कहा कि यह प्रसन्नता की बात है कि बिहार में ग़ज़ल कहने वाली महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। ज्योति जी अच्छी ग़ज़लकारा हैं। इनकी ग़ज़लें पाठकों से बहुत मधुर संवाद करती हैं। इनकी ग़ज़लों में देश-प्रेम भी है और समाज के प्रति निष्ठा भी।

कृतज्ञता-ज्ञापित करती हुई पुस्तक की लेखिका ज्योति मिश्र ने कहा कि ग़ज़ल साहित्य की अत्यंत लोकप्रिय विधा है। शायरी केवल दिल बहलाने के लिए नहीं है। इसमें समाज का फ़िक्र होना चाहिए। उन्होंने लोकार्पित पुस्तक से ग़ज़लों का पाठ भी किया। सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, वरिष्ठ कवि प्रेम किरण , डा रत्नेश्वर सिंह, भारतीय प्रशासनिक सेवा से अवकाश प्राप्त अधिकारी और कवि बच्चा ठाकुर, कुमार अनुपम, विभारानी श्रीवास्तव ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए तथा कवयित्री के प्रति शुभकामनाएँ व्यक्त की।

इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र ने वाणी-वंदना से किया। वरिष्ठ कवि डा रत्नेश्वर सिंह, कवयित्री आराधना प्रसाद, अनीता मिश्रा सिद्धि, डा मीना कुमारी परिहार, सिद्धेश्वर, डा शालिनी पाण्डेय, ईं अशोक कुमार, जय प्रकाश पुजारी, राजकांता राज, राज प्रिया रानी, इंदु भूषण सहाय, नीता सहाय, सूर्य प्रकाश उपाध्याय आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं का सुमधुर पाठ किया। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने किया। 

आयोजन में ओशीन शुभ लक्ष्मी, डा चंद्रशेखर आज़ाद, राज कुमार चौबे, सच्चिदानन्द शर्मा, अश्विनी कविराज, दिनेश पाठक, सतीश चंद्र आनन्द अन्नपूर्णा भारती, रुपम मिश्रा, मोहित कुमार, मो फ़हीम, नरेश कुमार समेत बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

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