शराबबंदी की विफलता का दोषी कौन? मेरे सवालों, तर्कों और तथ्यों का जवाब दें सरकार
पटना,06 अपैल।
शराबबंदी नीतीश कुमार का सबसे बड़ा सांस्थानिक भ्रष्टाचार साबित हुआ। इसके कारण बिहार में 𝟒𝟎 हज़ार करोड़ की अवैध समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है। शराबबंदी क़ानून के क्रियान्वयन की देखरेख वाले गृह और मद्य निषेध विभाग भी अधिकांश इनके पास ही रहे है। 

शराबबंदी लागू होने के बाद बिहार में 𝟏𝟏 लाख केस दर्ज कर 𝟏𝟔 लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है। अब तक 𝟓 करोड़ लीटर से अधिक शराब बरामद की गई है।

विगत 𝟓 साल में 𝟐 करोड़ लीटर से अधिक शराब जब्त की गई है यानि प्रतिदिन औसतन 𝟏𝟏 हजार लीटर से अधिक! बिहार पुलिस के अपने आंकड़ों के अनुसार 𝟐𝟎𝟐𝟔 में औसतन 𝟑 लाख 𝟕𝟎 हजार 𝟔𝟖𝟒 लीटर प्रति महीने अवैध शराब बरामद की गई है यानि 𝟏𝟐,𝟑𝟓𝟔 लीटर प्रतिदिन।

यह तो सिर्फ दिखावटी जब्त शराब है लेकिन जमीनी सच्चाई के अनुसार बिहार में प्रतिदिन शराब की खपत 𝟏 लाख 𝟕𝟎 लाख लीटर से अधिक की है। बिहार सरकार के मुताबिक़ 𝟐𝟎𝟐𝟔 में 𝟏𝟖 प्रतिशत अधिक शराब बरामद की गई यानि शराबबंदी और पुलिस के दकियानुसी आंकड़ों के बावजूद भी बरामदगी में 𝟏𝟖% का उछाल है। 

अवैध शराब के अलावा इस कानून की विफलता के कारण बिहार में सूखा और अन्य प्रकार के नशे की सामग्री का कारोबार 𝟒𝟎 फ़ीसदी बढ़ा है। युवा गांजा, ब्राउन शुगर व नशीली दवाओं का सेवन कर रहे हैं। 

अब आप कल्पना करिए कि वास्तविकता में बिहार में शराब की उपलब्धता कितनी सहज और सरल है? सरकार यह क्यों नहीं बताती कि बिहार की सीमा में करोड़ो लीटर शराब कब, कैसे, क्यों और किसके सहयोग से आ रही है? कोई पैराशूट से तो गिराकर जाता है नहीं? सरकार जब्त की बजाय खपत के भी आंकड़े सार्वजनिक करे। 

आपको जानकर हैरानी होगी कि 𝟐𝟎𝟎𝟒-𝟎𝟓 में संपूर्ण बिहार के ग्रामीण इलाकों में 𝟓𝟎𝟎 से भी कम शराब की दुकानें थीं। 𝟐𝟎𝟎𝟓 में पूरे बिहार में लगभग 𝟑𝟎𝟎𝟎 हज़ार शराब की दुकाने थी जो मात्र 𝟐𝟎𝟏𝟓 तक नीतीश कुमार के 𝟏𝟎 वर्षों में बढ़कर 𝟔𝟎𝟎𝟎 से अधिक हो गयी। और इनमें से अधिकांश दुकाने नीतीश कुमार ने ग्रामीण क्षेत्रों-पंचायतों में खुलवाई ताकि हर घर शराब पहुँचाई जा सके।

आप कल्पना कीजिए आज़ादी के बाद 𝟏𝟗𝟒𝟕 से लेकर 𝟐𝟎𝟎𝟓 में यानि 𝟓𝟖 वर्षों में बिहार में केवल 𝟑𝟎𝟎𝟎 दुकाने ही खोली गयी लेकिन नीतीश कुमार ने 𝟏𝟎 वर्षों में ही इसे बढ़ाकर दुगुना यानि 𝟔𝟎𝟎𝟎 कर दिया। 𝟓𝟖 वर्षों में औसतन बिहार में प्रति वर्ष संपूर्ण बिहार में मात्र 𝟓𝟏 दुकाने ही खुलती रही लेकिन इनके 𝟐𝟎𝟎𝟓-𝟐𝟎𝟏𝟓 के 𝟏𝟎 वर्षों में प्रतिवर्ष औसतन 𝟑𝟎𝟎 शराब की दुकाने खोली गयी।

आज ये शराबबंदी के नाम पर सुधारक बनने का स्वांग कर रहे है लेकिन यथार्थ यह है कि इसके नाम पर इन्होंने संस्थागत भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर अफसरशाही को बेलगाम, भ्रष्ट, आरामपरस्त और तानाशाह बनाया है। 

बिहार में शराबबंदी कानून अब मजाक बन गया है। इस कानून की आड़ में केवल गरीबों को निशाना बनाया जा रहा है। शराबबंदी कानून के तहत करीब 𝟏𝟔 लाख से अधिक जिन लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं इनमें सबसे अधिक गरीब, दलित, पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग के लोग हैं।

बिहार में शराबबंदी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि पुलिस के कारण ही शराब की तस्करी हो रही है और पुलिस का एकमात्र काम रह गया है भ्रष्टाचार, उगाही और कानून का दुरुपयोग करने वालों को संरक्षण देना।

𝟏𝟔 लाखों लोगों की गिरफ्तारी के बावजूद भी सप्लायर और तस्करों को गिरफ्तार नहीं किया गया, किसी भी जिले के एसपी, डीएसपी या बड़े अधिकारी पर कार्रवाई नहीं की गई है. उन्होंने यहां तक कहा कि सरकार जिसको चाहती है, उसी पर कार्रवाई होती है, चयनात्मक कार्रवाई होती है।

सरकार उन अधिकारियों और प्रशासनिक लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं करती जो भ्रष्टाचार के माध्यम से शराबबंदी को विफल करना चाहते हैं?

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