सियासी पाखंड की पराकाष्ठा: भाजपा का आक्रोश मार्च या अस्मिता पर राजनीति का भद्दा प्रदर्शन?
पटना। सत्ता के गलियारों से निकलकर जब संवेदनाएं सड़क पर उतरती हैं, तो अक्सर उनमें न्याय की गूँज कम और चुनावी नगाड़ों का शोर ज्यादा सुनाई देता है। आज पटना में भाजपा द्वारा आयोजित आक्रोश मार्च इसी सियासी विरोधाभास का जीता-जागता उदाहरण बन गया है। 



जिसे भाजपा महिला सम्मान की लड़ाई बता रही है, बिहार की जनता की नजरों में वह दिखावे की राजनीति और वैचारिक गुलामी का प्रदर्शन मात्र बनकर रह गया है।
 अपराध का नालंदा मॉडल और सत्ता की चुप्पी
सवाल उठना लाजिमी है कि आज सड़कों पर उतरी ये संवेदनशील महिलाएं और नेता उस वक्त कहां थे, जब मुख्यमंत्री के गृह जिले नालंदा में एक महिला को सरेआम चौराहे पर रोककर दुष्कर्म का प्रयास किया गया? 

अपराधियों का दुस्साहस इतना कि उन्होंने इस घिनौने कृत्य का वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दिया। क्या वह बिहार की बेटी नहीं थी?

 हाल ही में नालंदा में ही एक नाबालिग लड़की के साथ हथियार के बल पर दरिंदगी हुई जिसे उसके पिता ने अपने आंखों से देखने के बावजूद कानून पर भरोसा न होने के कारण आरोपी के विरुद्ध शिकायत नहीं दर्ज कराई और न्याय न मिलने के अभाव में उस नाबालिग पीड़िता ने मौत को गले लगा लिया। 



पटना से लेकर दरभंगा तक 3 - 4 - साल की मासूमों के साथ होती सामूहिक दरिंदगी की खबरें रोज अखबारों की सुर्खियां बनती है, लेकिन तब एनडीए गठबंधन के इन सुरक्षा प्रेमियों की जुबान पर ताले जड़े रहते है।

 सीबीआई की सुस्ती और नीतिगत विफलता
पटना का बहुचर्चित नीट छात्रा मामला आज भाजपा के महिला सुरक्षा के दावों की पोल खोलता है। स्थानीय पुलिस से लेकर सीबीआई तक, महीनों बीत जाने के बाद भी जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुंची।



हैरानी की बात यह है कि मुख्य आरोपी मनीष रंजन के खिलाफ 3 महीने तक चार्जशीट दाखिल नहीं की गई, जिसके कारण पॉक्सो कोर्ट से उसे जमानत मिल गई। क्या यह केंद्र और राज्य की डबल इंजन सरकार की विफलता नहीं है?

उत्तराखंड अपमान और दोहरी नैतिकता
सबसे तीखा सवाल तो बिहार की उन बेटियों की अस्मिता का है, जिसकी कीमत उत्तराखंड के एक भाजपा नेता द्वारा लगाई गई थी। 

उस समय पटना की सड़कों पर यह हुजूम क्यों नहीं दिखा? 

जब पूरे बिहार की बेटियों के स्वाभिमान को सरेबाजार नीलाम करने की कोशिश हुई, तब ये घड़ियाली आंसू बहाने वाली नेत्रियां किस बिल में छिपी थीं? शम्भू गर्ल्स हॉस्टल कांड से लेकर सारण तक, हर जगह चुप्पी ही भाजपा का असली चरित्र रही है।

घर से शुरू हो नारी सम्मान
जिस दल के दर्जनों सांसदों और विधायकों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हों, उसके मुंह से नारी सम्मान की बात बेमानी लगती है। 

यदि नारी सम्मान के प्रति संवेदनाएं इतनी ही गहरी हैं, तो इसकी शुरुआत शीर्ष स्तर से होनी चाहिए। 

आज बिहार की जनता इन आंदोलनकारियों से पूछ रही है. यह मार्च न्याय के लिए है या सत्ता की गुलामी को प्रमाणित करने के लिए? सत्ता के मद में चूर होकर गुलामी की पराकाष्ठा पार करने वाले इन नेताओं को याद रखना चाहिए कि सम्मान कभी चुनिंदा नहीं होता।

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