बिहार: चुनावी रेवड़ियों के बोझ तले दबता प्रदेश और सत्ता की

बिहार इस समय अपने इतिहास के सबसे कठिन आर्थिक दौर से गुजर रहा है। एक तरफ राज्य का खजाना खाली है, वहीं दूसरी ओर सत्ता के गलियारों में राजनीतिक समीकरण बिठाने का खेल विकास पर भारी पड़ रहा है।

विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए NDA गठबंधन ने वादों की झड़ी लगा दी थी। महिलाओं के खाते में राशि, मुफ्त बिजली और पेंशन में वृद्धि जैसी घोषणाओं ने राज्य के राजकोष पर 60,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ डाल दिया।

बजट का गणित: 3 लाख 17 हजार करोड़ का मूल बजट तीन अनुपूरक बजटों के बाद 4 लाख 32 हजार करोड़ तक पहुंच गया, लेकिन यह केवल कागजी आंकड़े बनकर रह गए ।

इस वित्तीय कुप्रबंधन का सीधा असर जमीन पर दिख रहा :

निर्माण कार्य ठप: राज्य में चल रहे विकास कार्यों का लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का भुगतान रुका हुआ है। ठेकेदार और मजदूर काम छोड़ने पर मजबूर हैं।

छात्रों का संकट: "स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड" के भरोसे देश-विदेश में पढ़ रहे बिहार के हजारों छात्रों की फीस का भुगतान रुक गया है, जिससे उनके शैक्षणिक भविष्य पर तलवार लटक रही है।

भर्तियों पर ब्रेक: नई शिक्षक भर्ती की पर ब्रेक लगी रही है, जिससे राज्य के बेरोजगार युवाओं में भारी आक्रोश है।

वित्त विभाग के हालिया आदेशों ने राज्य की कमर तोड़ दी है। 6 फरवरी को 1 करोड़ से अधिक की निकासी पर रोक और 27 फरवरी को वेतन, पेंशन व संविदाकर्मियों के मानदेय की पर लगी पाबंदी यह बताने के लिए काफी है कि बिहार "आर्थिक दिवालियापन" की कगार पर है।

जब राज्य को एक मजबूत आर्थिक दिशा की जरूरत थी, तब भाजपा केंद्रीय नेतृत्व केवल राजनीतिक बिसात बिछाने में व्यस्त दिखा।

मंत्रिमंडल विस्तार में देरी: 15 अप्रैल को सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री की कुर्सी तो मिल गई, लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार को लटकाए रखना भाजपा की मंशा पर सवाल उठाता है।

बिना सारथी के वित्त विभाग: नीतीश कुमार के पिछले 145 दिनों के कार्यकाल में न कोई पूर्णकालिक वित्त मंत्री था और न ही विभाग का प्रधिन सचिव। यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के लिए प्राथमिकता "कुर्सी" की है, "कोष" प्रबंधन की नहीं।

बिहार इस समय एक ऐसी वित्तीय खाई में है जहाँ से निकलने के लिए ठोस नीतिगत निर्णयों की आवश्यकता है, न कि राजनीतिक जोड़-तोड़ की। यदि भाजपा और केंद्रीय नेतृत्व ने जल्द ही बिहार की आर्थिक स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया, तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। 
बिहार में बैंकों का निवेश यथा कर्ज बांटनै का उदासीन रवैया भी अलग समस्या रही हो। वीते 31 मार्च तक 5.25 लाख करोड़ से अधिक जमा की तुलना 3 लाख करोड रुपए ही कर्म बटे । साख:जमा अनुपात बढाने का भगीरथ प्रयास का नतीजा उत्साहजनक रहा है।
वही नये सीएम सम्राट चौधरी ने नौकरी-रोजगार बढाना ध्येय उद्देश्य से नवम्बर तक 5 लाख करोड़ र्पये के निजी निवेश की कार्य योना बना चलनै की जानकारी दी है।इससे बडे,मंझोले और लघु उद्योग लगाने का मार्ग प्रशस्त होगा।


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