बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में वरिष्ठ साहित्यकार अमरेन्द्र नारायण की पुस्तक का हुआ लोकार्पण, हुई लघु-कथा-गोष्ठी
साहित्य की महान आकांक्षा की पूर्ति है उपन्यास "सम्मान-पथ"
पटना, 0२ फरवरी । सुविख्यात संचारविद और साहित्यकार अमरेन्द्र नारायण का उपन्यास "सम्मान पथ" वस्तुतः साहित्य की उस महान आकांक्षा की पूर्ति है, जिसका संबंध समाज के हित की भावना से है। लेखक ने अपने उपन्यास में "उत्साह" के महत्त्व को सिद्ध करते हुए, यह कहना चाहा है कि उत्साह एक ऐसा बल है, जिससे सागर लाँघा जा सकता है और नियति बदली जा सकती है। हताशा मनुष्य को दुर्बल करती है और उत्साह बली बनाता है।

यह बातें सोमवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, सम्मेलन द्वारा प्रकाशित, जबलपुर के सुप्रसिद्ध लेखक अमरेन्द्र नारायण की पुस्तक "सम्मान-पथ" के लोकार्पण-समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि मनुष्य पर उसके मन का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। मन यदि प्रसन्न और उत्साहित हो तो वह व्यक्ति न केवल सदा-स्वस्थ रहता है, अपितु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफल होता है। इसके विपरीत एक हताश व्यक्ति आलसी, अस्वस्थ और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में असफल होकर, परिवार और समाज पर बोझ बन जाता है। इसलिए मन को सबल बनाना और प्रत्येक परिस्थिति में उत्साह बनाए रखना आवश्यक है। उपन्यासकार ने इस पुस्तक के माध्यम से ग्रामीण-युवकों को, नूतन तकनीकी का सदुपयोग करते हुए, कृषि को उन्नत करने में उत्साह-पूर्वक यत्न करने का आह्वान किया है और इसे "सम्मान-पथ" बताया है। इस उपन्यास का प्रत्येक अंश पाठकों में उत्साह का सृजन करता है।

समारोह के मुख्य अतिथि पद्मश्री विमल जैन ने कहा कि लोकार्पित पुस्तक के विद्वान लेखक को मैं दशकों से देखता और पढ़ता रहा हूँ। ग्रामीण-संस्कृति को लेखक ने इस कृति में बहुत ही सुंदर और सार्थक रूप में चित्रित किया है। ग्राम्य-परिवेश में जो आत्मीयता का स्वर है, वह अत्यंत प्रभावशाली ढंग से पुस्तक में अभिव्यक्त हुआ है। 

कृतज्ञता-ज्ञापित करते हुए उपन्यासकार श्री नारायण ने कहा कि यह कथा बिहार के एक सुदूर ग्रामीण अंचल की है। इस उपन्यास का मुख्य पात्र एक अभियन्ता है किंतु उसके मन में अपने गाँव के लिए एक सुंदर सपना पल रहा होता है। वह अपनी अर्जित तकनीक के सहारे अपने गाँव के भविष्य की एक सुंदर पटकथा लिखता है। अपने साथियों और अन्य ग्रामीणों के सहयोग से उसके सपने पूरे होते हैं और भारत के एक खुशहाल गाँव का उदय होता है।
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई के पूर्व वैज्ञानिक डा मिथिलेश कुमार सिंह, सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद, डा मधु वर्मा, सुप्रसिद्ध स्त्री-रोग-विशेषज्ञ डा किरण शरण, नेशनल इंस्टिच्युट ऑफ टेक्नोलौजी के संकायाध्यक्ष प्रो संजीव सिन्हा तथा दिवाकर तेजस्वी ने भी अपने विचार व्यक्त किए और लेखक को अपनी शुभकामनाएँ दी। ।
इस अवसर पर आयोजित लघुकथा-गोष्ठी में, डा शंकर प्रसाद ने "रंग", विभा रानी श्रीवास्तव ने "लौटती राह" शीर्षक से, डा पुष्पा जमुआर ने "सपना था", सिद्धेश्वर ने "गूँज", प्रो समरेंद्र नारायण आर्य ने "मर्द", डा मीना कुमारी परिहार ने "हवा में गाँठ", ऋचा वर्मा ने "तामझाम", डा पूनम देवा ने "अंतर्द्वंद्व", सागरिका राय ने "ठिकाना", अरविंद कुमार वर्मा ने "संस्कार", कुमार अनुपम ने "नौटंकी", चित्तरंजन लाल भारती ने "तरक़्क़ी", नीता सहाय ने "अधूरे सपने" तथा अर्जुन प्रसाद सिंह ने "सुईवाला भिखारी" शीर्षक से अपनी लघुकथाओं के पाठ किए। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन ईं अशोक कुमार ने किया। 
वरिष्ठ व्यंग्यकार ईं बाँके विहारी साव, डा शालिनी पाण्डेय, सागरिका राय, डा शंकर नाथ, सूर्य प्रकाश उपाध्याय, प्रफुल्लचंद्र ठाकुर, नरेश चंद्र माथुर, डा किरण वर्मा, कृष्णदेव पाल, सीमा देवनाथ, आशा नारायण, डा मनोज कुमार, डा चंद्र शेखर आज़ाद, प्रेम अग्रवाल निर्माल कुमार अश्विनी कुमार आदि प्रबुद्ध श्रोता उपस्थित थे।

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