मुग्ध करनेवाली प्रांजल भाषा थी

 सम्मेलन-परिसर में आयोजित हुआ जयंती-समारोह एवं राष्ट्रीय-गीतोत्सव

पटना, २७ जनवरी। काव्य-सौष्ठव के लिए विख्यात प्रफुल्ल चंद्र ओझा "मुक्त" की भाषा अत्यंत प्रांजल और मुग्धकारी थी। उनके गद्य में भी कविता का लालित्य और माधुर्य देखा जा सकता है। उन्होंने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में अधिकार पूर्वक लिखा। वहीं अनन्य हिन्दीसेवी बलभद्र कल्याण नगर के मनीषी विद्वानों के बीच "साहित्य-सारथी" के रूप में जाने जाते थे। आज से तीन दशक पूर्व, जिन दिनों बिहार की राजधानी पटना में साहित्यिक गतिविधियों पर विषाद का ताला पड़ गया था। जब साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र रहे, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने भी मौन धारण कर लिया था, तब साहित्य-सारथी बलभद्र कल्याण ने अपना द्विचक्री-रथ पर आरूढ़ होकर नगर में साहित्यिक चुप्पी को तोड़ा और एक नवीन सारस्वत-आंदोलन का शंख फूँका था। साहित्यिक आयोजनों की झड़ी लगाकर राजधानी को पुनः जीवंत बना दिया।

यह बातें सोमवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, आयोजित गणतंत्र दिवस एवं जयंती-समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि, मुक्त जी आकाशवाणी से भी सक्रियता से जुड़े रहे। वे मंचों की शोभा ही नही विद्वता के पर्याय भी थे। उन्होंने अपने विद्वान पिता साहित्याचार्य चंद्रशेखर शास्त्री द्वारा आदिकवि महर्षि बाल्मीकि विरचित विश्व-विश्रुत महाकाव्य "रामायण" के हिन्दी-अनुवाद का श्रम-साध्य प्रकाशन किया था, जो एक बड़ी उपलब्धि है। 

सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, कल्याण जी की पुत्री सुजाता वर्मा, डा रत्नेश्वर सिंह, डा पूनम आनन्द, विभारानी श्रीवास्तव, शुभचंद्र सिन्हा, ईं आनन्द किशोर मिश्र आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।



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