होम्योपैथी में है हेपाटाईटिस प्रतिरोधक दवा

हेपाटाईटिस का अर्थ है लीवर की सूजन और बी शब्द एक प्रकार के विषाणु वायरस की केटेगरी है। इस रोग की पुष्टि रक्त परीक्षण से होती है।हेपाटाइटिस की अन्य श्रेणियों भी है जैसे ए सी डी ई इत्यादि। यह वर्गीकरण वायरसों की कैटेगरी के आधार पर किया जाता है। हेपाटाइटिस बी के वायरस द्वारा संक्रमित लिवर की इस बीमारी से यदि रोग शीघ्र पकड़ में आ जाए तो ठीक होने की गुंजाइश रहती है, किंतु रोग  बहुत गहरा हो जाने पर इसकी तुलना एड्स से भी अधिक घातक हो सकती है ,यही कारण है कि इस रोग से बचाव के लिए अधिक ध्यान दिया जा रहा है

      आजकल एलोपैथी में इस रोग से बचाव के लिए महंगे महगें इंजेक्शन के वैक्सीनय या टीके लगवाने का दौर खूब जोरों पर चल रहा है, इसके साथ-साथ संक्रामक बीमारी होने के कारण अन्य उपायों पर भी बहुत ध्यान दिया जा रहा है जैसे दूषित पानी व खाद पदार्थों का सेवन न करें, साफ-सफाई का भरपूर ख्याल रखा जाए, रक्त लेने पूर्व रक्त की जांच करवा ली जाए, पानी के पाइप लाइनों के बीच से टूट-फूट ना होने दें, असुरक्षित यौन संबंधों से बचाव रखें।रोगी व्यक्ति से घनिष्ठा न बरतें, शेविंग की रेजर नेल कटर,सेविंग ब्रश का केवल व्यक्तिगत प्रयोग करें इत्यादि, इत्यादि।हेपेटाइटिस बी के ग्रसित होने पर प्रारंभ में रोग लक्षण बिल्कुल स्पष्ट नहीं होते विशेषतः नवजात शिशु में तो और भी मुश्किल होती है फिर भी यह लीवर की सूजन संबंधी रोग है इसलिए लीवर के अन्य रोगों के समतुल्य इस रोग के लक्षण होते हैं प्रारंभ में फ्लू जैसे लक्षण प्रकट होना, भूख न लगना, अत्यधिक थकावट प्रकट होना, ठंड लगना, हल्का बुखार,शरीर में दर्द और बाद में पीलिया जैसे लक्षण हो ना ऐसे आंतों की सामान्य क्रिया से व्यवधान होने से लगना दाहिनी तरफ की पसली में भारीपन और दर्द मिचली आदि अलग-अलग किस्म के सहायक लक्षण उत्सर्ग जैसे वजन घटना आदि प्रकट होते हैं।
    इस रोग की गंभीर अवस्था में रोगी कल लिवर बहुत खराब हो जाता है इसके कारण पैरों में सूजन, पेट में  पानी भर जाना तथा बेहोशी या मुर्छा  आना। पेशाब में रक्त आना,सांस रुकना, गुर्दे फेल हो जाना और अंत में मृत्यु के शिकार तक हो जा सकते हैं
इसी कारण रोगग्रस्त हो जाने पर होम्योपैथी में रोगी के शारीरिक मानसिक ,व्यक्तिगत लक्षणों और अनुभूतियों में साथ साथ अन्य सहकारी उपसर्ग व अन्य दशाओं को ध्यान में रखकर होम्योपैथी दवा का चयन किया जाता है, फिर भी संकेत की दृष्टि से इस रोग में प्रयोग होने वाली प्रधान और धियां ब्रायोनिया चेलिडोनियम आर्सेनिक एल्बम लाइकोपोडियम फास्फोरस मर्क सोल इत्यादि उल्लेखनीय है।
होम्योपैथिक के माध्यम से हेपाटाईटिस बी से बचाव के लिए ( प्रिव्हेन्टिव /प्रफिलैक्टिक ) निम्नांकित तीन दवाओं का सेवन आगे बताएं निर्देशानुसार करने से उसकी पूर्ति हो जाएगी और ऐसा वर्ग जो महंगे महंगे वैक्सीन (टीके) नहीं खरीद सकते,वे इन तीन दवाओं  प्रयोग कर  सकते हैं।
1-पहली दवा नक्स वोमिका 1M
2-दूसरी दवा चायना आफि  1M
3-तीसरी दवा काली म्यूरिये  1M

(क)सर्वप्रथम नक्स वोमिका 2 दिन तक एक एक खुराक लें। एक खुराक में दो बूंद लें।
(ख)दूसरी दवा इसी प्रकार‌ चायना‌ दो दिन तक एक एक खुराक लें। एक खुराक में दो बूंद लें।
(क) तीसरी दवा काली म्यूर  इसी प्रकार‌ लें। 
   इसी प्रकार एक माह तक लें।
बीच में एक सप्ताह छोड़ कर एक महीने और लें।
और अंत में लीवर को शक्तिशाली बनाए रखने के लिए कार्डुअस मैरीनस मदर टिंचर 15/20 बूंद सुबह शाम जब तक देते रहें तब तक रोग की आंशका हो। बच्चों को चार बूंद सुबह शाम सेवन करना है। कोई भी दवा चिकित्सक की सलाह से ही इस्तेमाल करें।
डॉ लक्ष्मी नारायण सिंह
मो 9204090774

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