क्या नीतीश कुमार अपने कहे मुताबिक बिहार में जातीय सर्वेक्षण करायेंगे ?

अरुण कुमार पाण्डेय 
जातिगत जनगणना नहीं कराने को लेकर केन्द्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में स्थिति स्पष्ट कर दिये जाने के खुलासा के साथ  एक बार फिर बिहार की सियासत राजनीति गरमाना तय है। 

आज तक  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत प्राय सभी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर पीएम नरेंद्र मोदी के निर्णय का इंतजार कर रहे थे। चौंकाने वाली बात यह है कि केंद्र सरकार ने न सिर्फ 2021 की जनगणना नहीं कराने के निर्णय का रुख स्पष्ट किया है बल्कि यह भी कहा है  कि 2011 की गणना में कई खामियां हैं। ऐसे में उस डेटा को विश्वसनीय मानकर कहीं इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।    

केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में साफ कर दिया  कर दिया है ओबीसी  जनगणना का काम मुश्किल है। वहीं नीतीश समेत कई दूसरे दल  जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं।
केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में यह कहा गया कि पिछड़ी जातियों की जाति आधारित गणना प्रशासनिक और बोझिल कार्य है । केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में हलफनामा दायर किया गया है और कहा गया है कि सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना 2011 में की गई थी और उसमें कई गलती थी।
सोच समझकर एक नीतिगत फैसले के तहत इस तरह की जानकारी को जनगणना के दायरे से अलग रखा गया है।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में हलफनामा दायर किया गया है और कहा गया है कि सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना 2011 में की गई थी और उसमें कई गलती और त्रुटि थी।

केंद्र ने खामियों को सामने रखते हुए कहा है कि 1931 जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि कुल जातियां 4,147 थीं लेकिन 2011 SECC में 46 लाख से ज्यादा पता चलते हैं। सरकार ने कहा है कि यह आंकड़ा वास्तव में हो ही नहीं सकता, संभव है कि इनमें कुछ जातियां उपजातियां रही हों।सरकार ने बताया है कि जनगणना करने वाले कर्मचारियों की गलती और गणना करने के तरीके में गड़बड़ी के कारण आकंड़े विश्वसनीय नहीं रह जाते हैं।

महाराष्ट्र सरकार की ओर से याचिका दायर कर मांग की गई थी कि केंद्र और संबंधित विभाग को निर्देश दिया जाए कि वह सामाजिक, आर्थिक एवं जातिगत जनगणना 2011 में दर्ज ओबीसी के जातीय आंकड़ों की जानकारी मुहैया कराएं। इस पर केंद्र ने कहा कि 2011 में इकट्ठा किए ओबीसी डेटा में काफी गलतियां हैं। सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि नौकरियों के लिए, शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश या चुनावों में किसी भी तरह से इस डेटा का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है और इसीलिए इसे आधिकारिक न करने का फैसला किया गया।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के सचिव की तरफ से दायर हलफनामे में कहा गया है कि केंद्र ने  जनवरी,2020  में एक अधिसूचना जारी कर जनगणना 2021 के लिए जुटाई जाने वाली सूचनाओं का ब्योरा तय किया था और इसमें अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति से जुड़ी सूचनाओं सहित कई क्षेत्रों को शामिल किया गया लेकिन इसमें जाति के किसी अन्य श्रेणी का जिक्र नहीं किया गया है।
सरकार ने साफ कहा है कि एसईसीसी 2011 सर्वेक्षण ओबीसी सर्वेक्षण नहीं है जैसा कि आरोप लगाया जाता है, बल्कि यह देश में सभी घरों में जातीय स्थिति का पता लगाने की व्यापक प्रक्रिया थी। यह मामला गुरुवार को न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। अब आगे की सुनवाई 26 अक्टूबर को होगी।





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