बक्सर-चौसा-गाजीपुर के समीप गंगा में पाए जाने वाले शवों का रहस्य


लेखक वह भी इन शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में गंगा के किनारे बालू गड़े एवम बहते लाशों को काफी संख्या में सुनकर काफी आश्चर्य हुआ। पहले मैं समझ रहा था कि निहायत गरीब असहाय लोग लकड़ी के अभाव में उसे गंगा के किनारे बलुआही   मिट्टी में शवों को गाड़ कर या सांकेतिक मुखाग्नि देकर गंगा में बहा कर लौट जाते थे।

आज मेरे इस संशय का पर्दाफाश हुआ।इसके कई कारणों का पता चला है

1 जिन विनिश्चित घाटो या उसके अगल बगल के गंगा के किनारे जहां लकड़ी का कोई डिपो नहीं है वहां शवों को गंगा के किनारे बालू में गाड़ कर या सांकेतिक मुखाग्नि की प्रक्रिया कर उसे गंगा में प्रवाहित कर देते हैं।

2 उपर्युक्त प्रक्रिया के पीछे आज एक रहस्य का पता चला है। इसमें कितनी सत्यता है यह प्रशासन के लिए जांच का विषय है। वह यह है कि बक्सर के गंगोली में ग्राम पंचायत है जिसका जिसकी आबादी 20000 के आसपास है। वर्षों पहले यहां भोजपुर मठिया से एक साधु आए थे। उनका नाम राम ब्रह्मचारी बाबा कहा जाता था। आसपास के गांव के लोग उनके शिष्य बन गए। बाबा का सोच था कि निष्प्राण शरीर को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाए ताकि जल जीव उक्त मृत शरीर से अपना भूख मिटा सके। उस समय गंगा में भी सोंस(डॉल्फिन) सहित काफी जल जीव रहते थे। फलत उनके शिष्य एवं उसके देखा देखी अन्य लोग भी बाबा की बात को मान कर मृत शरीर को गंगा में प्रवाहित करना प्रारंभ कर दिए।

3 कुछ लोगों का यह कहना है कि गरीबी की वजह से भी मजबूरीवश शवों का प्रवाह गंगा में कर देते हैं। इसी गांव के श्री भरत मिश्रा ने अपने बुजुर्गों के हवाले से शवों के गंगा में प्रवाहित करने की बात स्वीकार की है।

4 किंतु यह परंपरा बक्सर जिले के नरवत,केशवपुर,बड़कागांव तथा गंगा के उस पार गाजीपुर,शेरपुर और गहमर की ही क्यों है? जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है इसका मुख्य कारण गरीबी है जिसके कारण यह एक परंपरा बन चुकी हैं। काल क्रम में गरीब एवं सक्षम दोनों स्तर के व्यक्ति इसका पालन करने लगे है। 

5 यह कौन नहीं जानता है कि कुछ ब्रह्मचारी, संत एवं मठाधीश तथा सर्पदंश से मृत व्यक्तियों को शव को जलाने की परंपरा हिंदुओं में नहीं है। उनके शव को गगरी एवं पत्थरों से कसकर बांधकर गंगा में प्रवाहित कर देने की परंपरा तो पहले से है ताकि वह शव नदी के सतह पर न उतरा पाए तथा जल जीव उन्हें जल के भीतर ही खा जाएं या गंगा में बाढ़ की स्थिति में बालु में दबकर नीचे चला जाए तथा कालक्रम में वे गल कर मिट्टी बन जाए।

6. 16वीं  शताब्दी में रामचरितमानस के रचयिता संत तुलसीदास ने भी तो साफ साफ कहा है कि "क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच रचित यह अधम शरीरा"।
अर्थात भगवान के द्वारा प्रदत्त शरीर को तो इसी में मिल जाना ही है क्योंकि यह सब ईश्वर के द्वारा ही निर्मित है। जिस ने इसका निर्माण किया उसी ने इसे अपने में मिला लिया। इसमें कौन सी आश्चर्य की बात है?

7. जहां गंगा नहीं है वहां के लोग शवों को पुरानी बगीचा या उसके लिए निश्चित श्मशान में विधिवत अग्नि दाह कर देते हैं।

8. जहां तक नवजात या अयज्ञी बच्चे के मृत शरीर को जमीन में गाड़ने की परंपरा तो पहले से ही है। ऐसा तो मैं स्वयं पिछले 83 वर्षों से देखते आ रहा हूं।

9. जहां तक कानपुर के गांव और उन्नाव के गांव के शवों का यमुना घाट के पास जमीन के नीचे गाड़ने का प्रश्न है यह तो मात्र 30 साल पुरानी है। शव को जमीन के नीचे गाड़ने या गंगा में प्रवाहित करने की परंपरा हिंदू अनुसूचित जाति या सवर्ण में कोई फर्क नहीं किया जाता। जिस घाट पर सवर्णों का शव जलाया जाता है उसी घाट पर अनुसूचित जातियों या अन्य जातियों के शव को भी जलाया जाता है। इसी प्रकार जमीन के नीचे गाड़ने में भी इनमे कोई अंतर नही है।
10. यहां तक कि छत्तीसगढ़ का प्रश्न है, वहां गंगा नदी नहीं है। वहां के लोग पर्यावरण के प्रति विशेष  सजग हैं। फलत लोग पर्यावरण का संरक्षण हेतु न तो शव को जलाते हैं और न आसपास की किसी नदी में प्रवाहित करते हैं। शव को सीधे जमीन में गड्ढा खोदकर डालकर उसे मिट्टी से भर देते हैं। बहुत अच्छी अच्छी परंपरा है। यद्यपि हिंदू शास्त्रों के परंपरा के प्रतिकूल है किंतु फिर भी पर्यावरण संरक्षण हेतु वर्तमान युग की सबसे अच्छी परंपरा है।
11. जहां तक झारखंड की बात है तो यहां नारायण पंथ, कबीर पंथ एवं रविदास के अनुयाई ज्यादा है। यहां कबीरपंथियों की संख्या लगभग 15% है। इसमें वैरागी भी सम्मिलित है। यहां सभी जातियों के बच्चों, अविवाहितो, बिना यज्ञोपवीत संस्कार वालों, संतो एवं महात्माओं के शव को जमीन में गाड़ा जाता है।

12. जहां तक उत्तर प्रदेश की चर्चा जैसा कि ऊपर की जा चुकी है, गाजीपुर जिले के मालिकपुर, दौलतपुर, ककरही, हथौरा, ईसोपुर, रामपुर एवं रायपुर आदि गांवों में शवों को जल समाधि दी जाती है। उन्हें जलाया नहीं जाता। कुछ एक जगह में शव को मुखाग्नि देकर उसे जल से बुझा कर पत्थर या गगरी से बांधकर जल समाधि दी जाती है।

यूपी एवं बिहार में सनातन धर्म विरोधी ताकतें बौखला कर सरकार को बदनाम करने की साजिश में लिप्त हैं। उसने प्रत्येक मृतक शरीर, जो वर्षों पूर्व जमीन में गाड़े गए या जल समाधि दी गई, उसे कोरोना से हुई मृत्यु का हल्ला मचाकर लोगों को भ्रमित कर रहे है। इसे अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने श्रृंगवेरपुर, फाफामऊ  के घाट पर मृतकों की मात्र गिनती कर उसे कोरोना से मृत बताकर लोगों को भड़काने की, कड़ी आलोचना की है। उत्तर प्रदेश की सरकार ने इसका तुरंत संज्ञान लिया तथा इन घाटों पर विद्युत शवदाह गृह बनाने का संभवत निर्णय भी ले लिया है, जो अत्यंत सराहनीय है।

जहां तक बिहार का प्रश्न भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 जी के अंतर्गत प्रावधानित शेड्यूल 11अंतर्गत यह जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों की है तथा अनुच्छेद डब्लू के शेड्यूल 12 के अंतर्गत शव को दफनाने या शमशान घाट की जिम्मेदारी संबंधित शहरी स्थानीय निकायों की है। किंतु दोनों निकाय अपनी अपनी जिम्मेदारी सही रूप से नहीं निभा रहे हैं। कारण राज्य सरकार के सहयोग की कमी है।

जहां तक पटना नगर निगम का प्रश्न है यहां पर बने शवदाह गृह, घाटों पर लकड़ी बेचने वाले व्यापारियों के साथ साठ गांठ के कारण बराबर खराब रहते हैं ताकि लकड़ी बेचने वाले ऊंचे दामों पर लकड़ी बेच सकें। यह अत्यधिक घृणित कार्य है।

अत पटना नगर निगम को विद्युत शवदाह गृहों के सुचारू रूप से संचालन हेतु एक विद्युत सहायक अभियंता तथा एक कनीय अभियंता को विशेष रूप से नियुक्त करना चाहिए। ताकि शवदाह गृह में खराबी आते ही तुरंत उसका मरम्मत किया जा सके। साथ ही प्रत्येक निर्मित या निर्मित किए जाने वाले शवदाह गृहों के लिए एक अलग फीडर लाइन तथा एक सुयोग्य मैकेनिक/इलेक्ट्रीशियन की नियुक्ति निगम द्वारा किए जाने की आवश्यकता है। उसे किसी कॉन्ट्रैक्ट या आउटसोर्सिंग एजेंसी को कतई नहीं सौंपा जाना चाहिए।

एक बात और  है कि बिहार सरकार के वन एवं पर्यावरण विभाग की डिपो लगभग सभी जिलों में है। जहां डाक के द्वारा लकड़िया ऑक्शन की जाती है या बेची जाती है। बिहार सरकार को एक दो डिपो प्रत्येक बर्निंग घाट पर खोला जाना चाहिए। जिसे यह निदेश हो की जो शव लकड़ी से जलने के लिए घाटों पर आए उसे कम से कम 7 मन लकड़ी वह मुफ्त में मुहैया कराए। कारण एक लाश को जलाने में कम से कम 7 मन लकड़ी तो लग ही जाता है। अगर बिहार सरकार मृतकों के परिजनों को दाह संस्कार के लिए 7 मन लकड़ी मुफ्त देने का निदेश जारी करती है तो मृत आत्मा का आशीर्वाद तो सरकार को मिलेगा ही साथ ही मृतक के परिजन भी सरकार की जय जयकार करेंगे।

मैने पूर्व में यह आग्रह किया था कि घाटों पर संस्कार सामग्री बेचने का रेट तय कर उसका बोर्ड लगवा दें। साथ ही निगम पर दाह संस्कार के लिए पंडितों को पारिश्रमिक भी तय कर दे। घाट पर डोम राजा की नियुक्ति निगम करें। उसे वेतन दे तथा प्रत्येक शव के लिए अग्निदान का रेट भी तय कर दें ताकि वहां मोल जोल का झंझट नहीं होने पाए। अगर कोई इसका उल्लंघन करें तथा इसका विरोध करें तो उसके विरुद्ध तुरंत कानूनी कार्रवाई हो।

इसके अतिरिक्त मेरी यह राय है कि गंगा किनारे प्रत्येक घाट पर विद्युत शवदाह गृह एवं दाह संस्कार के लिए मुफ्त लकड़ी की व्यवस्था निश्चित तौर पर सरकार करे। आखिर अंतिम संस्कार के दौरान भी सरकार मदद के लिए नहीं खड़ी होती तो कब खड़ी होगी? हमें विश्वास है कि हमारे इस प्रस्ताव का तुरंत संज्ञान लिया जाए।

                              धन्यवाद,

श्री योगेंद्र त्रिपाठी,
आजीवन सदस्य,
भारतीय लोक प्रशासन संस्थान
निदेशक,
के एन सहाय पर्यावरण एवं शहरी विकास संस्थान,
ईमेल yogendratripathi70@gmail.com
मोबाइल-8789497192


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