बार काउंसिल ऑफ इंडिया की 7 सदस्यीय समिति ने तैयार किया  एड्वोकेट्स प्रोटेक्सन बिल का ड्राफ्ट
नई  दिल्ली, 02 जुलाई। 
बार काउंसिल की 7 सदस्यीय समिति ने देश के अधिवक्ताओं की सुरक्षा हेतु एड्वोकेट्स प्रोटेक्सन एक्ट संबंधी रुपरेखा व ड्राफ्ट बिल तैयार कर लिया है।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया की समिति जिसमें सर्वश्री 1. एस. प्रभाकरन, वरीय अधिवक्ता,
उपाध्यक्ष, बार काउंसिल ऑफ इंडिया 2. देवी प्रसाद ढल, वरीय अधिवक्ता, सह-अध्यक्ष,बार काउंसिल ऑफ इंडिया एंव कार्यकारिणी अध्यक्ष, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ट्रस्ट
3. सुरेश चंद्र श्रीमाली, सह-अध्यक्ष, बार काउंसिल ऑफ इंडिया 4. शैलेन्द्र दुबे, सदस्य,बार काउंसिल ऑफ इंडिया एवम्‌ प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया 5. प्रशांत कुमार सिंह,
अध्यक्ष, को-ऑरडिनेशन कमेटी, राज्य बार काउंसिल 6. ए. रामी रेड्डी, कार्यकारिणी सह-अध्यक्ष, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ट्रस्ट 7. श्रीनाथ त्रिपाठी, अध्यक्ष, लीगल ऐड
कमेटी हैं, 
 अपने ड्राफ्ट मे अधिवक्ताओ के हितों की सुरक्षा के लिए जो प्रस्ताव किये हैं
उनमे कुल मिलाकर ॥6 धाराएँ बनाई गयी हैं। प्रस्तावित बिल के अनुसार किसी भी अधिवक्ता या उसके परिवार को किसी प्रकार की क्षति या चोट पहुँचाने, धमकी देने या उसके मुवक्किल द्वारा दिये गये किसी प्रकार की सूचना का खुलासा करने हेतु पुलिस या किसी पदाधिकारी के द्वारा अनुचित दबाव या किसी वकील को किसी मुकदमे की पैरवी करने से रोकने का दबाव या वकील की सम्पत्ति को किसी रुप में नुकसान
पहुंचाने या किसी भी वकील के विरुद्ध अपशब्द या अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल, इस प्रस्तावित कानून के तहत्‌ अपराध की श्रेणी मे आयेगा ऐसे अपराधों के लिए सक्षम
न्यायालय द्वारा 6 माह से 2 वर्ष तक की सजा तथा साथ में 40 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। साथ ही अधिवक्ता को हुए नुकसान की भरपाई हेतु अलग से जुर्माना भी सक्षम त न्यायालय द्वारा लगाया जा सकता है।
अधिवक्ताओं के विरुद्ध उक्त अपराध गैर-जमानतीय एव सेंज्ञय अपराध की श्रेणी में आयेंगे, जिनकी जाँच पुलिस के उच्च-अधिकारी द्वारा ही की जायेगी। उक्त अपराधों की जाँच  तीस दिन की अवधि में पूरी करनी होगी एवम्‌ उक्त अपराध संबंधी मामले जिला व सत्र न्यायाधीश या समकक्ष के न्यायालयो द्वारा ही देखे जायेंगें।

हॉलाकि ये प्रावधान यदि कोई अधिवक्ता ही अभियुक्त हो, तो लागू नहीं होंगे।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया की समिति ने अधिवक्‍ताओं को जरुरत पडने पर पुलिस द्वारा समुचित सुरक्षा मुहैया कराने का प्रावधान प्रस्तावित किया है। उक्त सुरक्षा हेतु माननीय
उच्च न्यायालय में आवेदन देना होगा एवम्‌ उच्च न्यायालय आवेदक के आचरण एवम्‌ सुरक्षा की आवश्यकता संबंधी सभी तथ्यों की जाँच कर; एवम्‌ आवश्यक हो तो राज्य बार
काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया से अधिवक्ता के आचरण या अन्य बातों संबंधी जानकारी लेकर, पुलिस प्रशासन को उस अधिवक्ता को सुरक्षा प्रदान करने हेतु आदेश
पारित कर सकेगा।

एक बार मुहैया की गयी पुलिस सुरक्षा की व्यवस्था, तब तक वापस नहीं ली जा सकती है, जब तक कि जिला जज, उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के निबंधक का इस
संबंध में स्पष्ट निर्देश नहीं प्राप्त हो जाये।

अधिवक्ताओ को न्यायालय का पदाधिकारी माना जायेगा एवम्‌ उनके साथ न्यायपलिका के पदाधिकारियों के भाँति ही व्यवहार करना होगा।

अधिवक्ता या वकील संघ के किसी शिकायत संबंधी मामलें के निपटारे के लिए जिला स्तर से लगायत सर्वोच्च न्यायलय तक के स्तर पर शिकायत निवारण समिति बनाई जायेगी, जिसके अध्यक्ष जिला स्तर के अधिवक्ताओं हेतु जिला जज, उच्च न्यायालय हेतु संबंधित मुख्य-न्यायाधीश (या उनके द्वारा नामित जज) एवम्‌ सर्वोच्च न्यायालय हेतु देश के प्रधान न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित जज होंगे। समिति के अन्य दो सदस्य राज्य बार काउंसिल व बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा मनोनित किये जायेंगे। मामलों का निपटारा आपसी बातचीत से किया जायेगा तथा आवश्यकता पड़ने पर समिति सरकार या किसी भी पदाधिकारी को उचित निर्देश या सुझाव दे सकेगी।
अधिवक्ताओं के कर्त्तव्यों के निर्वहन में किसी प्रकार की त्रुटी होने पर, अधिवक्ता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जायेगा एवम्‌ इस त्रुटि के संबंध में किसी प्रकार का सिविल या
आपराधिक विवाद किसी भी न्यायालय या प्राधिकरण में मान्य नहीं होगा।
कोई भी पुलिस अधिकारी किसी भी वकील को तब तक गिरफ्तार नहीं कर सकेगा जब तक मुख्य दण्डाधिकारी का स्पष्ट आदेश नहीं हो। किसी भी अधिवक्ता के विरुद्ध किसी प्रकार का आपराधिक मामला दर्ज होने पर, संबंधित पुलिस पदाधिकारी द्वारा नजदीकी
मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी को अविलंब सूचित किया जायेगा; एवम्‌ उक्त पुलिस पदाधिकारी को प्रथम सूचना रिपोर्ट के साथ-साथ मामले से संबंधित सभी कागजात व सबूत प्रस्तुत करने होंगे। मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी वकील को (जिसे अभियुक्त बनाया गया हो) 24 घंटों के अंदर सूचना  को देंगे तथा उक्त वकील या उनके प्रतिनिधि को सुनवाई का अवसर देंगे। तत्पश्चात या तो जमानत देंगे या अनुसंधान करने
के बाद उचित कार्यवाही का आदेश देंगे।
यदि मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी या समकक्ष दण्डाधिकारी को यह स्पष्ट हो कि उक्त वकील को सिर्फ इसलिए अभियुक्त बनाया जा रहा है चूँकि उसने वादी/सूचक
 या किसी गवाह के विरुद्ध किसी मुकदमें में कार्य किया है या मात्र पेशेगत राजनीति या द्वेष के कारण उक्त अधिवक्ता को झूठे केस में फँसाया गया है, तो वैसी स्थिति में अधिवक्ता को जमानत दी जायेगी। सत्र न्यायालय द्वारा देखे जाने वाले मामले, जिला व सत्र न्यायाधीश को प्रेषित किये जायेंगे।
ड्राफ्ट बिल में यह भी प्रस्तावित है कि किसी प्रकार के प्राकृतिक आपदा की स्थिति में राज्य व केन्द्र सरकार हरेक जरुरतमंद वकील को आवश्यकतानुसार कम से कम 45000 रु0 प्रति माह की आर्थिक सहायता प्रदान करेगी। इसी प्रकार ड्राफ्ट में प्रस्ताव देकर केन्द्र व राज्य सरकारों को अधिवक्ताओं हेतु बीमा एवम्‌ चिकित्सा हेतुं सामाजिक सुरक्षा
संबंधी योजनाएं लागू करने का प्रावधान करने को कहा गया है।
एड्वोकेट्स प्रोटेक्सन एक्ट को एक विशेष अधिनियम का दर्जा देने का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है, ताकि किसी अन्य कानून से इस अधिनियम का टकराव होने पर, इस बिल को प्रभावी माना जाये।

बी.सी.आई. के अध्यक्ष वरीय अधिवक्ता श्री मनन कुमार मिश्र ने कहा है कि उक्त ड्राफ्ट बिल को सभी राज्य बार काउंसिलों, सर्वोच्च न्यायालय व अन्य उच्च न्यायालयों के संघों को भेजा जा रहा है, एवम्‌ इसे प्रकाशित किया जा रहा है ताकि जिस संघ या वकील को कोई सुझाव देना हो, उन सुझावों पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा विचार विमर्श
करने के बाद ही ड्राफ्ट को माननीय विधि एवम्‌ न्याय मंत्री को भेजा जायेगा।

बी.सी.आई. द्वारा एक सप्ताह के अंदर सुझाव आमंत्रित किये गये हैं जिसे
 इमेल पर भेजा जा सकेगा।
श्री मिश्र ने कहा है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया का प्रयास होगा कि संसद से इस बिल को जल्द से जल्द पारित करा लिया जाये।

श्री मिश्र ने यह भी कहा कि यदि अधिवक्ताओं के सोशल मीडिया द्वारा किये गये कदाचार संबंधी नियमों को जल्द लागू नहीं किया जाता, तो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों
के आलोक में वकीलों के कदाचार संबंधी मामलों की जाँच सरकारी पदाधिकारियों एवम्‌ न्यायिक पदाधिकारियों द्वारा कराया जाना तय था। अतः ऐसी परिस्थिति से बचने के
लिए, पेशे की गरिमा को बरकरार रखना ही था एवम्‌ अपराधिक चरित्र व गलत आचरण करने वाले उग्रवादी किस्म के तथाकथित वकीलों के विरुद्ध अनुशसनात्मक कार्यवाही कर
पेशे से बाहर करना ही होगा।

बार काउंसिल वकीलों के कल्याण. के लिए हर संभव कदम उठाती है, लेकिन सर्वप्रथम यह कदाचार के मामलों में अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए सर्वोच्च वैधानिक संस्था है। जानबूझकर अपने चुनावी या निजी स्वार्थवश संस्था का मजाक बनाने का
प्रयास करने वाले लोग कभी सच्चे वकील हो ही नहीं सकते; न ही वैसे लोगों को इस सम्मानित पेशे में रहने का कोई अधिकार है।

बार काउंसिल ऐसे चंद गलत तत्वों के दबाव में नहीं आयेगी, क्योंकि खुशी की बात यह है कि आज भी 95 फीसदी से ज्यादा वकील सभ्य हैं एवम्‌ पेशे की मर्यादा का बखूबी
पालन करते हैं। पेशा इन्हीं 95 फीसदी के बदौलत जिन्दा है और हमेशा गरिमामयरहेगा।

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