बिहार: बजी सीएम की घंटी , विधायक ने सुनाई खड़ी खोटी, जून के अंतिम दिन पांच हजार अफसरों के ताबड़तोड़ सामूहिक तबादले में पैरवी और पैसे का खेल का आरोप

विधायक ज्ञानेन्द्र सिंह ज्ञानू बोले-80% मंत्री घूसखोर,इशारे में अशोक चौधरी पर भी साधा निशाना
कहा- तबादलों में भाजपा के मंत्रियों ने खूब लिए पैसा, जदयू के मंत्रियों में  सीएम का रहा डर 
सीएम की छवि धूमिल कर रहे मंत्री और वरिष्ठ नौकरशाह 
पटना,01 जुलाई।  बिहार सरकार के विभिन्न विभागों में जून के अंतिम दिन करीब पांच हजार अफसरों के ताबड़तोड़ सामूहिक तबादलों में पैरवी और पैसे का खेल होने का भाजपा के दो विधायकों ने खुला आरोप लगाकर  आज खलबली मचा दी।  बाढ के  विधायक ज्ञानेन्द्र सिंह ज्ञानू  और बिस्फी के विधायक हरि भूषण ठाकुर बचौल का बयान मीडिया में सुर्खियां बटोरने लगी। सरकार सकते में आ गयी। 
कुछ ही क्षणों के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय से हरि भूषण ठाकुर की मोबाइल की घंटी बजने लगी।मुख्यमंत्री जी बात करना चाहते हैं। बचौल ने लगभग पांच मिनट अपनी व्यथा कथा सुनाई। कहा- मुख्यमंत्री जी, इर्दगिर्द के कुछ लोगों ने आपके अमरत्व पर ग्रहण लगा दिया है। मेरे कहने पर नहीं पैसे  पर मेरे यहां  दूसरे की बीडीओ में पोस्टिंग कर दी गयी। जाति,आवासीय  और मृत्यु प्रमाणपत्र पत्र के लिए भी बेरोकटोक घूसखोरी हो रही है। ....... 
विधान परिषद परिसर में गुरुवार को शाम के करीब छह बजे मीडिया प्रतिनिधियों की उपस्थिति में ही फोन की घंटी बजी थी। थोड़ा हटकर बातचीत के बाद  शांत दिखे बचौल ने कहा- अपनी पूरी बातें मुख्यमंत्री जी को कह दी।भरोसा है,न्याय करेंगे। पहले दो बार फोन कर अपनी शिकायत लिखाने के बाद मुख्यमंत्रीजी से फोन बातचीत हुई है।
उसके पहले भाजपा विधायक बचोल ने  मीडिया प्रतिनियोजन से बातचीत में अपनी सरकार के कामकाज पर जमकर भड़ास निकाली धी।उन्होंने कहा कि सीएम की छवि धूमिल कर रहे मंत्री और वरिष्ठ नौकरशाह।  यहां तक कहा - एमएलए का महत्व चपरासी से भी कमतर हे। सरकार में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। थाना-ब्लौक में किसी का भी कोई काम बिना पैसे दिये नहीं होता है। बीडीओ के तबादले में लाखों के वारा-न्यारा होने की आम चर्चा है।तभी तो उनकी कहे की अनदेखी हुई है।
उधर ,भाजपा विधायक ज्ञानेन्द्र सिंह ज्ञानू  ने कहा  कि मंत्रियों ने अफसरों और कर्मचारियों के तबादले में जमकर घूस खाई है। उन्होंने अपनी ही पार्टी के मंत्रियों को ज्यादा निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि  सीएम  के डर से जदयू के मंत्रियों ने घूस कम खाई है।
उन्होंने आरोप का आधार पूछने पर कहा कि पक्की खबर कई उन अफसरों से ही मिली है, जिनका पैसे लेकर ट्रांसफर किया गया है। अफसरों को बुला-बुला कर उनसे पैसों की मांग की है।
ज्ञानू  सिंह ने इशारे में बिना नाम लिए कहा कि जदयू के एक मंत्री जो निर्माण विभाग से जुड़े हैं, उन्होंने भी जमकर ट्रांसफर के लिए पैसे लिए हैं। पैसे लेनेवाले मंत्री को उन्होंने हाइप्रोफाईल और जदयू में दूसरे दल से आनेवाला बताया है। मंत्री अशोक चौधरी पर उनका निशाना लगता दिख रहा था ।
विधायक  ज्ञानू   बिहार में मंत्री नहीं बनाये जाने के समय से ही पार्टी में नाराज चल रहे हैं। वे  पहले भी भाजपा के प्रदेश नेतृत्व पर  जमकर हमला बोल चुके हैं। उन्होंने  भाजपा नेतृत्व पर मंत्री बनाए जाने में जातीय समीकरणों का ख्याल नहीं रखने का आरोप लगाया था।उन्होंने अपनी पार्टी के  केन्द्रीय नेतृत्व से घूस खाने वाले मंत्रियों को हटाने की मांग की है।बिहार  के सरकारी महकमे में  तबादला उद्योग की चर्चा कांग्रेस शासन से ही होती रही है।एक जगह तीन वर्षों से अधिक जमे अधिकारियों कर्मचारियों का  पहले जून और दिसम्बर में सामूहिक  तबादला होता था ।मनचाही पोस्टिंग के लिए लेन-देन की आम चर्हचा होती रही है।नीतीश सरकार ने सिर्फ जून महीना  में तबादला का नियम लागू किया है। जून के बाद विभाग के राजपत्रित पदों के अधिकारियों का तबादला सीएम के आदेश से होता है। जून को तबादला का महीना कहा जाता है। हर साल जून महीने में अधिकारियों-कर्मियों का तबादला किया जाता है।मंत्रियों पर अब तक विपक्ष की तरफ से तबादला उद्योग चलाने का आरोप लगता रहा है,।
इस बार  सत्ताधारी दल में ही   मंत्रियों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं.। भाजपा के दो  विधायक ने ही नीतीश सरकार  को कटघरे में खड़ा कर दिया है।वहीं मंत्री मदन सहनी ने भी तबादला के लेक अपने विभाग के अपर मुख्य सचिव अतुल प्रसाद के खिलाफ मनमानी के आरोप के साथ इस्तीफा करने की ठानी है।
बिहार में किसी भी सरकार के लिए ट्रांसफर-पोस्टिंग कितना महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा   2017 में भी देखने को मिला था। यह  महागठबंधन सरकार में खटपट का कारण  बना था।नीतीश कुमार और लालू प्रसाद से नाता टूटने के पीछे का कारण भी  अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग था। लालू अपने पसंदीदा अफसरों को तैनात करना चाहते थे मगर नीतीश कुमार इसके लिए तैयार नहीं थे। धीरे-धीरे विवाद इतना बढ़ गया कि नीतीश कुमार ने अंतत: तेजस्वी के खिलाफ  रेलवे का होटल निजी हाथों में  सौंपने में  भ्रष्टाचार संबंधी सीबीआई मामले में नाम आने पर सफाई देने की मांग के बहाने राजद-कांग्रेस  से अलग होने का फैसला ले लिया था। लालू और नीतीश कुमार की नयी राजनीतिक दोस्ती 20 महीने में बिखर गई थी। नीतीश कुमार ने विपक्ष में बैठी भाजपा से नयी दोस्ती कर सरकार बना ली थी।हालांकि उसके पहले नीतीश कुमार ने विधानसभा में भाजपा के साथ विश्वासघात के आरोप को सिरे से खारिज करते हुए कहा था कि वे मिट्टी में मिल जायेंगे परंतु फिर भाजपा के साथ नहीं जायेंगे। अब  फिर  तबादला सरकार में विवाद का बड़  मुद्दा न बन जाय।मदन सहन का मंत्री पद छोड़ने की घोषणा और भाजपा के दो विधायकों का खुला आरोप नीतीश सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं है। पूर्व सीएम एवं हम के अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने भी मंत्री मदन सहनी की शिकायत का समर्थन कर सरकार की परेशानी बढा दी है।

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